अविवाहित बेटी को शादी तक भरण-पोषण और विवाह खर्च देना पिता का कानूनी दायित्व

रायपुर | कानून ने बेटी के हक को दी मजबूत आवाज

Chhattisgarh High Court Maintenance Ruling: एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसले में स्पष्ट किया है कि अविवाहित वयस्क बेटी को शादी तक अपने पिता से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) और विवाह खर्च पाने का पूरा कानूनी अधिकार है।
कोर्ट ने कहा कि बेटी के बालिग होने से पिता की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती। जब तक बेटी का विवाह नहीं हो जाता, तब तक उसका भरण-पोषण करना पिता का वैधानिक दायित्व है।

यह फैसला वर्ष 2025 (2025:CGHC:56721-DB) में सुनाया गया।


क्या है पूरा मामला?

यह मामला एक 25 वर्षीय युवती द्वारा दायर किया गया था। युवती ने अदालत को बताया कि उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली है और दूसरी पत्नी से उनके दो बच्चे हैं।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वह स्वयं अपना खर्च उठाने में सक्षम नहीं है, जबकि उसके पिता एक शासकीय शिक्षक हैं और उनकी मासिक आय 44,642 रुपये है।

बेटी ने अदालत से मांग की थी कि—

  • उसे मासिक भरण-पोषण दिया जाए
  • साथ ही शादी के खर्च के लिए 15 लाख रुपये दिए जाएं

पिता ने इस मांग का विरोध किया, जिसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा।


हाई कोर्ट ने क्या कहा?

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले
Poonam Sethi v. Sanjay Sethi (2022 SCC Online Del 69) का हवाला दिया।

कोर्ट ने उस फैसले का उल्लेख करते हुए कहा—

“एक पिता अपनी अविवाहित बेटी की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।
बेटी के भरण-पोषण, शिक्षा और विवाह खर्च का दायित्व पिता का कानूनी और नैतिक कर्तव्य है।
हिंदू पिता के लिए कन्यादान एक पवित्र दायित्व है, जिससे वह पीछे नहीं हट सकता।”


फैमिली कोर्ट का फैसला भी बरकरार

हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैमिली कोर्ट ने पूरी जांच के बाद सही निर्णय दिया था।
फैमिली कोर्ट ने माना कि—

  • याचिकाकर्ता पिता की संतान है
  • वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है

इस आधार पर कोर्ट ने पिता को आदेश दिया कि—

  • बेटी को 2,500 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण दिया जाए (शादी तक)
  • साथ ही 5 लाख रुपये विवाह खर्च के रूप में दिए जाएं

हाई कोर्ट ने इस फैसले को उचित और कानूनी ठहराया।


क्यों अहम है यह फैसला?

यह निर्णय उन हजारों अविवाहित बेटियों के लिए न्याय की मिसाल है, जो पारिवारिक परिस्थितियों के कारण आर्थिक असुरक्षा का सामना करती हैं।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि—

  • बेटी का अधिकार केवल नाबालिग उम्र तक सीमित नहीं
  • विवाह तक पिता की जिम्मेदारी बनी रहती है
  • कानून बेटी के सम्मान और सुरक्षा के साथ खड़ा है

यही वजह है कि Chhattisgarh High Court Maintenance Ruling को महिला अधिकारों की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *