Raipur Sahitya Utsav 2026 के अंतिम दिन साहित्य और विचार की दुनिया में गहन विमर्श देखने को मिला। पुरखौती मुक्तांगन परिसर में आयोजित इस दिन का कार्यक्रम साहित्यकार बच्चू जांजगीरी को समर्पित रहा, जहां “संविधान और भारतीय मूल्य” विषय पर एक अत्यंत विचारोत्तेजक संवाद का आयोजन किया गया।
इस परिचर्चा में वरिष्ठ चिंतक शिव प्रकाश, वरिष्ठ साहित्यकार गुरुप्रकाश और हितेश शंकर ने भारतीय संविधान की आत्मा, उसकी सांस्कृतिक जड़ों और वर्तमान समय की चुनौतियों पर गहन विचार साझा किए। संवाद के सूत्रधार डॉ. भूपेंद्र करवंदे रहे।
भारतीय सहिष्णुता केवल स्वीकार नहीं, समावेश है – शिव प्रकाश
वरिष्ठ चिंतक शिव प्रकाश ने कहा कि भारतीय सहिष्णुता केवल एक-दूसरे को स्वीकार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समावेश की भावना को केंद्र में रखती है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के शिकागो धर्म संसद के ऐतिहासिक वक्तव्य का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन परंपरा सभी धर्मों को एक ही सत्य की ओर जाने वाले मार्ग मानती है।
उन्होंने रामकृष्ण परमहंस के जीवन से उदाहरण देते हुए बताया कि भारतीय दृष्टि में पूजा-पद्धतियों को लेकर विवाद नहीं, बल्कि संवाद की परंपरा रही है। शास्त्रार्थ को उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्राचीन और सशक्त माध्यम बताया।
कोरोना काल में भारत द्वारा 57 देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ भारतीय जीवन-दर्शन का व्यवहारिक रूप है। साथ ही, तुलसी, पीपल और बरगद की पूजा को उन्होंने पर्यावरण संरक्षण से जुड़ा भारतीय मूल्य बताया।
संविधान का मंदिर संसद है, गर्भगृह उसका भाव – गुरुप्रकाश
वरिष्ठ साहित्यकार गुरुप्रकाश ने डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि यदि संविधान सही ढंग से कार्य नहीं करता, तो दोष संविधान का नहीं, बल्कि उसे लागू करने वालों का होता है।
उन्होंने संविधान की मूल प्रति में राम, महावीर और गौतम बुद्ध के चित्रों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह दर्शाता है कि भारतीय संविधान अपनी सांस्कृतिक परंपरा से प्रेरित है।
उन्होंने मौलिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता पर जोर देते हुए कहा कि राष्ट्रनिष्ठा भाषा, जाति और क्षेत्र से ऊपर होनी चाहिए। संविधान को जीवन मूल्य के रूप में अपनाना आज की आवश्यकता है।
संविधान का राजनीतिक औजार बनना चिंता का विषय – हितेश शंकर
वरिष्ठ साहित्यकार हितेश शंकर ने कहा कि वर्तमान समय में संविधान का कई बार राजनीतिक उपकरण की तरह उपयोग किया जा रहा है, जो चिंता का विषय है। उन्होंने डॉ. अंबेडकर के जीवन के विविध आयामों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि भारतीयता ही संविधान की आत्मा है।
उन्होंने 42वें संविधान संशोधन, हिन्दू कोड बिल और स्वतंत्रता के बाद के राजनीतिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान का उद्देश्य समाज को जोड़ना और दिशा देना है।
पुस्तक विमोचन ने जोड़ा साहित्य का नया अध्याय
इस अवसर पर दो पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इनमें
- डॉ. लुनेश कुमार वर्मा का कविता संग्रह ‘एक लोटा पानी’
- चंचल विजय शुक्ला की पुस्तक ‘माटी के लाल: शहीदों को श्रद्धांजलि’
शामिल रहीं।
छत्तीसगढ़ी काव्य पाठ में लोकसंस्कृति की गूंज
रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के अंतर्गत श्यामलाल चतुर्वेदी मंडप में रविवार को तृतीय सत्र के दौरान “छत्तीसगढ़ी काव्य पाठ” का आयोजन किया गया। यह सत्र प्रख्यात साहित्यकार पवन दीवान को समर्पित रहा। कार्यक्रम के सूत्रधार भरत द्विवेदी रहे।
कविताओं में बसी छत्तीसगढ़ की आत्मा
काव्य पाठ की शुरुआत श्रद्धा संतोषी महंत से हुई। कवि मीर अली मीर ने
“महानदी संगम में राजिम”,
“नई पटियावय दाई कोई…”,
“नंदा जाहि का रे…”
जैसी रचनाओं से लोकभावना को स्वर दिया।
हास्य कवयित्री शशि सुरेंद्र दुबे ने छत्तीसगढ़ी भाषा की महिमा पर कविता पाठ किया, जिसे श्रोताओं ने खूब सराहा।
कवि रामेश्वर शर्मा ने श्यामलाल चतुर्वेदी और पवन दीवान को समर्पित रचनाएं प्रस्तुत कीं।
वहीं कवि एवं गीतकार रामेश्वर वैष्णव ने “झन बुलव मां-बाप ल…” गीत और विवाह पर आधारित हास्य कविता से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया।
सूत्रधार भरत द्विवेदी ने अपने चिर-परिचित अंदाज में संचालन कर वातावरण को जीवंत बनाए रखा।
साहित्य उत्सव का भावपूर्ण समापन
कुल मिलाकर, रायपुर साहित्य उत्सव 2026 का अंतिम दिन विचार, संविधान और लोककाव्य के अद्भुत संगम के साथ संपन्न हुआ। यह आयोजन छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना, सांस्कृतिक मूल्यों और जनसंवेदनाओं को सशक्त रूप से सामने लाने में सफल रहा।
