भिलाई पुलिस की कार्रवाई पर हाईकोर्ट सख्त: मामूली विवाद में हिरासत, हथकड़ी और अपमान पर जताई गंभीर चिंता

रायपुर | छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

Bhilai police custodial torture case को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भिलाई पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता जताई है।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविन्द्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि यदि याचिकाकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोप सिद्ध होते हैं, तो यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन है, जो प्रत्येक नागरिक को जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा का अधिकार प्रदान करते हैं।


सिनेमा हॉल के मामूली विवाद से शुरू हुआ मामला

मामला एक सिनेमा हॉल में हुई मामूली मौखिक बहस से जुड़ा है। थिएटर स्टाफ द्वारा पुलिस को बुलाए जाने के बाद याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने पूर्वाग्रहवश मामले को गंभीर अपराध का रूप दे दिया।
उन पर महिला की मर्यादा भंग करने और पुलिस से मारपीट जैसे गंभीर आरोप लगाते हुए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया।


हिरासत में कथित अत्याचार और सार्वजनिक अपमान

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि उन्हें हिरासत में मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी गई।
इतना ही नहीं, न्यायिक रिमांड मिलने के बावजूद हथकड़ी लगाकर सार्वजनिक रूप से घुमाया गया और उनसे कथित रूप से
“अपराध करना पाप है, पुलिस हमारा बाप है” जैसे नारे लगवाए गए।

इसके अलावा, स्पष्ट चोटें होने के बावजूद समय पर मेडिकल जांच नहीं कराई गई, जो कानून और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है।


हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा—

“इस मामले में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई संवैधानिक सुरक्षा कवच के मूल में प्रहार करती है।
यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह कानून के शासन की अवहेलना का स्पष्ट उदाहरण है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी भी नागरिक को अपमान, उत्पीड़न या हिरासत में दुर्व्यवहार का शिकार नहीं होना चाहिए।


SHO के आचरण पर विशेष नाराजगी

कोर्ट ने विशेष रूप से थाना प्रभारी (Respondent No. 2) के आचरण पर “गंभीर चिंता और कड़ी असहमति” दर्ज की।
पीठ ने कहा कि SHO ने पुलिस शक्तियों का प्रयोग करते समय लापरवाह और जल्दबाजी भरा रवैया अपनाया, जो स्वीकार्य नहीं है।


DGP को दिए गए सख्त निर्देश

याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश दिया कि—

  1. सभी पुलिस अधिकारियों को संविधान, कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों
    (Arnesh Kumar, D.K. Basu, Satender Kumar Antil) की याद दिलाई जाए।
  2. संबंधित SHO के आचरण की जांच कर आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
  3. गिरफ्तारी, रिमांड और हिरासत से जुड़े मामलों में संवैधानिक सुरक्षा उपायों के उल्लंघन पर सख्त विभागीय कार्रवाई के निर्देश जारी किए जाएं।

पृष्ठभूमि: जमानत सुनवाई में पुलिस पर सवाल

इससे पहले दुर्ग के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष जमानत सुनवाई में स्वयं शिकायतकर्ता ने विवाद को मामूली बताते हुए नो ऑब्जेक्शन दिया था।
अदालत ने तब भी पुलिस के आचरण को शक्ति का दुरुपयोग माना था।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में मुआवजा, विभागीय जांच और कार्रवाई की मांग करते हुए कहा कि उनके कोई आपराधिक antecedents नहीं हैं और उन्हें अवैध रूप से हिरासत में रखा गया।


न्यायालय का संदेश स्पष्ट

हालांकि कोर्ट ने विवादित तथ्यों पर विस्तृत सुनवाई से परहेज किया, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि
पुलिस को कानून का संरक्षक होना चाहिए, न कि भय का कारण।

यह फैसला एक बार फिर याद दिलाता है कि कानून के ऊपर कोई नहीं और नागरिकों की गरिमा सर्वोपरि है।

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