रायपुर, 19 जनवरी 2026 | Bastar Tamarind Chutney
बस्तर में इमली की चटनी सिर्फ एक स्वाद नहीं, बल्कि परंपरा और संस्कृति का हिस्सा है। वर्षों से स्थानीय लोग अपने पारंपरिक भोजन के साथ इमली की खट्टी-मीठी चटनी का आनंद लेते आ रहे हैं। अब इसी पारंपरिक स्वाद को नई पहचान देने के लिए सुकमा जिले में एक सराहनीय पहल की गई है।
वन विभाग ने स्थानीय संसाधनों के उपयोग और महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बस्तर की प्रसिद्ध इमली से बनी “इमली चटनी” को औपचारिक रूप से लॉन्च करने की तैयारी की है।
🌿 वन धन विकास केंद्र से हुआ इमली चटनी का शुभारंभ
वन मंत्री श्री केदार कश्यप के मार्गदर्शन में यह उत्पाद वन धन विकास केंद्र, सुकमा के माध्यम से बाजार में उतारा जा रहा है।
इस पहल का उद्देश्य केवल एक उत्पाद लॉन्च करना नहीं, बल्कि—
- वनोपज का मूल्य संवर्धन
- बस्तर की पारंपरिक पहचान को बढ़ावा
- और ग्रामीण महिलाओं को स्थायी आजीविका प्रदान करना है
👩🍳 महिला स्व सहायता समूह निभा रहा अहम भूमिका
छत्तीसगढ़ राज्य लघु वनोपज संघ द्वारा किए गए अनुसंधान और गुणवत्ता मानकों के आधार पर इमली चटनी का उत्पादन किया जा रहा है।
वन धन विकास केंद्र से जुड़ी “नवा बिहान” महिला स्व सहायता समूह की महिलाएं इस पूरी प्रक्रिया की रीढ़ हैं।
महिलाओं को—
- वैज्ञानिक विधि से निर्माण
- स्वच्छता और गुणवत्ता मानक
- आधुनिक पैकेजिंग तकनीक
का विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे उत्पाद की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
💪 आत्मनिर्भरता की ओर मजबूत कदम
प्रशिक्षण के बाद महिलाओं में आत्मविश्वास और आर्थिक आत्मनिर्भरता साफ नजर आने लगी है।
बस्तर संभाग में इमली की प्रचुर उपलब्धता को देखते हुए यह पहल स्थानीय संसाधनों के प्रभावी उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण बनकर सामने आई है।
🌱 वनोपज संग्राहकों को मिलेगा सही मूल्य
इमली चटनी के उत्पादन से—
- वनोपज संग्राहकों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा
- बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी
- और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ पहुंचेगा
वन विभाग की यह पहल महिला सशक्तिकरण, रोजगार सृजन और आजीविका संवर्धन की दिशा में एक मजबूत कदम मानी जा रही है।
आने वाले समय में बस्तर की इमली चटनी न केवल छत्तीसगढ़ के घर-घर में स्वाद बढ़ाएगी, बल्कि सुकमा की महिलाओं की मेहनत, आत्मनिर्भरता और सफलता की कहानी को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
यह पहल साबित करती है कि स्थानीय संसाधन और सही मार्गदर्शन मिलकर ग्रामीण विकास की मजबूत नींव रख सकते हैं।
