10 मिनट डिलीवरी के दबाव के खिलाफ देशभर में हड़ताल, 2 लाख से ज्यादा डिलीवरी वर्कर्स सड़क पर उतरे

India Delivery Workers Strike ने नए साल की पूर्व संध्या पर देश का ध्यान खींचा, जब दिल्ली, मुंबई समेत कई शहरों में हजारों ऐप-आधारित डिलीवरी वर्कर्स हड़ताल पर चले गए। इन कर्मचारियों का आरोप है कि 10 मिनट में डिलीवरी जैसी नीतियां उनकी जान, सेहत और सम्मान—तीनों को खतरे में डाल रही हैं।

भारतीय फेडरेशन ऑफ ऐप-बेस्ड ट्रांसपोर्ट वर्कर्स के अनुसार, इस हड़ताल में 2 लाख से ज्यादा मजदूर शामिल हुए।


“तेजी नहीं, इंसानियत चाहिए”

डिलीवरी वर्कर्स की मुख्य मांग है कि 10 मिनट डिलीवरी वाले मार्केटिंग मॉडल पर तुरंत रोक लगे। उनका कहना है कि ट्रैफिक से भरे भारतीय शहरों में इतनी कम समय सीमा उन्हें तेज रफ्तार, रेड लाइट जंप और जोखिम भरी ड्राइविंग के लिए मजबूर करती है।

इसके साथ ही, वर्कर्स ने मांग की—

  • उचित और तय वेतन
  • सुरक्षा और सम्मान
  • स्वास्थ्य बीमा और पेंशन सहित सामाजिक सुरक्षा
  • ऑटोमेटेड पेनल्टी सिस्टम में सुधार

“गलती सिस्टम की, सज़ा हमारी”

हैदराबाद के 41 वर्षीय एक स्विगी डिलीवरी ड्राइवर ने बताया कि उन्हें प्रति ऑर्डर सिर्फ 5 रुपये बेस रेट मिलता है।
वे रोज़ शाम 7 बजे से सुबह 5 बजे तक काम करते हैं।

“पेट्रोल, बाइक मेंटेनेंस और खाना—सब कुछ हमें खुद देना पड़ता है। महीने में 20 हजार रुपये कमाता हूं, लेकिन घर का किराया और बच्चों की फीस में सब चला जाता है,” उन्होंने कहा।


मुंबई: 16 घंटे काम, फिर भी अनिश्चित कमाई

मुंबई के 30 वर्षीय डिलीवरी राइडर मोहम्मद नुमान बताते हैं कि उन्हें रोज़ 35 से 40 ऑर्डर पूरे करने का दबाव रहता है।

“1 किलोमीटर के लिए 3–4 मिनट और 4 किलोमीटर के लिए 10 मिनट का समय दिया जाता है। समय पूरा करने के लिए तेज चलाना ही पड़ता है,” उन्होंने कहा।

एक अन्य डिलीवरी वर्कर ने बताया कि वे अक्सर रेड लाइट जंप करने को मजबूर होते हैं—न करने पर पेनल्टी और करने पर चालान, दोनों जेब से।


कंपनियों का जवाब और विवाद

जोमैटो के सह-संस्थापक दीपिंदर गोयल ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि हड़ताल का असर डिलीवरी पर नहीं पड़ा और सिस्टम “न्यायसंगत” है।

हालांकि, तेलंगाना गिग वर्कर्स यूनियन ने पलटवार करते हुए कहा—

“डिलीवरी इसलिए हुई क्योंकि वर्कर्स लॉग-आउट करने का खर्च नहीं उठा सकते, न कि सिस्टम इंसाफ करता है।”


गिग इकोनॉमी: रोज़गार या नया शोषण?

भारत में गिग वर्कफोर्स के 2030 तक 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह मॉडल असंगठित श्रम को कॉरपोरेट नियंत्रण में बांध देता है, जहां न नौकरी की सुरक्षा है, न स्थायी आय।


कानून बना, लेकिन ज़मीनी हकीकत अलग

2020 में केंद्र सरकार ने गिग वर्कर्स के लिए सामाजिक सुरक्षा का वादा किया था, लेकिन क्रियान्वयन धीमा है।
राजस्थान, कर्नाटक और झारखंड जैसे राज्यों ने कानून बनाए हैं, जबकि कई राज्यों में अब भी इंतजार है।


India Delivery Workers Strike केवल वेतन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सवाल है कि क्या सुविधा और रफ्तार की कीमत किसी की जान और भविष्य से चुकाई जानी चाहिए। नए साल की इस हड़ताल ने देश को सोचने पर मजबूर कर दिया है—क्या 10 मिनट की डिलीवरी, इंसान से ज्यादा अहम हो गई है?

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