अमेरिका में हनुमान प्रतिमा विवाद: भारतीय-अमेरिकी पहचान, आस्था और ‘अमेरिकन ड्रीम’ पर उठते सवाल

Hanuman statue controversy in America: एक समय था जब भारतीय-अमेरिकी समुदाय को लगता था कि उनकी कहानी भी उसी ‘अमेरिकन ड्रीम’ की ओर बढ़ रही है, जहां पूरी तरह घुल-मिल जाने के बाद पहचान सवाल नहीं बनती। ठीक वैसे ही, जैसे फिल्म Harold and Kumar Go to White Castle ने दिखाया कि एशियाई-अमेरिकी भी उसी सपने का हिस्सा हैं—समान इच्छाओं, समान आकांक्षाओं के साथ।

लेकिन टेक्सास में स्थापित भगवान हनुमान की विशाल प्रतिमा ने इस भरोसे को झकझोर दिया है। यह प्रतिमा निजी जमीन पर बनाई गई, फिर भी यह बहस का केंद्र बन गई कि अमेरिका में धार्मिक विविधता की स्वीकार्यता आखिर कितनी गहरी है।

विरोध, नारों और बढ़ती बेचैनी

प्रतिमा के उद्घाटन के दौरान जहां वंदे मातरम् और द स्टार-स्पैंगल्ड बैनर एक साथ गूंजे, वहीं बाहर कुछ कट्टरपंथी ईसाई समूहों ने विरोध प्रदर्शन किया।
प्रदर्शनकारियों ने भगवान हनुमान को “डेमन गॉड” तक कह दिया। एक स्थानीय नेता ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया—

“हम टेक्सास में एक झूठे हिंदू भगवान की मूर्ति क्यों बनने दे रहे हैं? हम एक ईसाई राष्ट्र हैं।”

यहीं से भारतीय-अमेरिकी समुदाय के भीतर यह सवाल और गहरा हो गया कि क्या धार्मिक पहचान तब तक ही स्वीकार्य है, जब तक वह ‘दिखाई न दे’?

हनुमान: शक्ति नहीं, सेवा का प्रतीक

इस प्रतिमा परियोजना को दशकों से समर्थन दे रहे डॉक्टर श्रीनिवासाचार्य तमिरिसा ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि वे अमेरिका को लंबे समय तक एक प्रॉमिस्ड लैंड मानते रहे।
उन्होंने विरोध कर रहे लोगों को समझाने की कोशिश की कि भगवान हनुमान भय या वर्चस्व के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे साहस, सेवा और विनम्र शक्ति के आदर्श हैं।

हिंदू परंपरा में हनुमान

  • शक्ति को नम्रता से नियंत्रित करने का प्रतीक हैं
  • प्रभु राम के प्रति अटूट निष्ठा के लिए जाने जाते हैं
  • हनुमान चालीसा किसी प्रभुत्व का नहीं, बल्कि निर्भयता और आत्मबल का पाठ है

असली चिंता विरोध नहीं, माहौल है

भारतीय-अमेरिकियों को सबसे अधिक चिंता विरोध से नहीं है—क्योंकि अमेरिका में विरोध First Amendment का हिस्सा है।
असल बेचैनी उस समय और माहौल को लेकर है, जब यह विवाद सामने आया। सोशल मीडिया और सार्वजनिक विमर्श में बढ़ती एंटी-इंडियन भावना और हिंदूफोबिया के बीच यह घटना एक बड़े संकेत की तरह देखी जा रही है।

‘व्हाइट कैसल’ से आगे की राह

एक दौर में भारतीय-अमेरिकियों को लगता था कि वे भी उस ‘व्हाइट कैसल’ तक पहुंच जाएंगे—जहां उनकी आस्था, संस्कृति और पहचान समाज के ताने-बाने का स्वाभाविक हिस्सा होगी।
लेकिन हनुमान प्रतिमा विवाद ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि अमेरिका का स्वागत क्या केवल तब तक है, जब तक विविधता चुपचाप मौजूद रहे?

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