नई दिल्ली। कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के गुटों के बीच तनाव लगातार बढ़ता जा रहा है। सत्ता साझेदारी के 2.5-2.5 साल फार्मूले के इर्द-गिर्द यह tug-of-war अब खुलकर सामने आने लगा है।
दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान स्थिति को साधने में जुटा है, लेकिन तकरार थमने का नाम नहीं ले रही।
सूत्र बताते हैं कि सरकार बनने के बाद सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच ढाई-ढाई साल के सीएम समझौते पर बात हुई थी। अब जब शिवकुमार की बारी की चर्चा तेज हो रही है, तो कर्नाटक की राजनीति में अस्थिरता के बादल फिर मंडराने लगे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि सियासी इतिहास इस फार्मूले को कभी सफल नहीं मानता—राजस्थान से लेकर छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र तक, हर जगह यह प्रयोग विवाद, बगावत और अंततः सत्ता-परिवर्तन का कारण बना है।
राजस्थान: पायलट बनाम गहलोत—फॉर्मूला विवाद का सबसे बड़ा उदाहरण
राजस्थान में इसी फार्मूले ने अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच तीखी जंग को जन्म दिया।
कहा गया था कि राज्य में भी 2.5-2.5 साल का समझौता हुआ था, लेकिन गहलोत ने पूरे पाँच साल की पारी खेली।
पायलट की नाराज़गी ने 2020 में बड़ा संकट खड़ा किया, पर नेतृत्व बदलाव नहीं हुआ।
छत्तीसगढ़: बघेल बनाम टीएस सिंह देव—समझौता रहा सिर्फ कागज़ी
छत्तीसगढ़ में भी स्थिति लगभग वैसी ही रही।
टीएस सिंह देव ने अपने लिए आधी पारी की मांग की, लेकिन भूपेश बघेल की पकड़ और OBC समर्थन भारी पड़ा।
नतीजतन सत्ता हस्तांतरण नहीं हुआ और पांच साल बाद कांग्रेस सत्ता गंवा बैठी।
महाराष्ट्र: ढाई साल फॉर्मूले ने तोड़ा भाजपा–शिवसेना गठबंधन
2019 के चुनाव बाद उद्धव ठाकरे और बीजेपी के बीच भी यही मुद्दा फूटा।
शिवसेना ने दावा किया कि ढाई-ढाई साल का फार्मूला तय हुआ था, लेकिन भाजपा ने यह मानने से इनकार कर दिया।
नतीजतन गठबंधन टूट गया और शिवसेना–कांग्रेस–एनसीपी की महा विकास अघाड़ी सरकार बनी, जिसे बाद में एकनाथ शिंदे की बगावत ने गिरा दिया।
1997: मायावती–कल्याण सिंह समझौता भी हुआ नाकाम
1997 में बसपा और भाजपा ने मुख्यमंत्री पद पर 6-6 महीने का साझा फार्मूला बनाया था।
मायावती ने अपनी पारी पूरी की, लेकिन कल्याण सिंह की बारी आते ही गठबंधन टूट गया।
यह फार्मूला भी राजनीतिक इतिहास में असफल प्रयोग के रूप में दर्ज हो गया।
क्या कर्नाटक भी उसी राह पर?
कर्नाटक में अब स्थिति वही पुराना सवाल खड़ा करती है—
क्या ढाई-ढाई साल का फार्मूला वाकई संभव है?
या फिर यह भी उन असफल प्रयोगों की सूची में शामिल हो जाएगा?
सिद्धारमैया के पास मजबूत जातीय आधार—AHINDA—का समर्थन है।
वहीं डीके शिवकुमार वोक्कालिगा समाज के सबसे बड़े नेता हैं।
कांग्रेस दोनों को नाराज़ नहीं कर सकती, मगर दोनों में से किसी एक को ज्यादा खुश करना भी बड़ा जोखिम है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस सत्ता संघर्ष का समाधान कैसे निकालती है—
समझौते से, बदलाव से या फिर टकराव से।
