आयुष्मान भारत योजना पर संकट: 200 करोड़ बकाया से अस्पतालों ने रोकी सेवा, मरीजों को जेब से खर्च करना पड़ा

रायपुर, 5 सितम्बर 2025।
गरीबों को मुफ्त इलाज का वादा करने वाली केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य योजना “आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (PM-JAY)” छत्तीसगढ़ में गंभीर संकट से जूझ रही है। निजी अस्पतालों पर करीब 200 करोड़ रुपये के बकाया पहुँच जाने से कई संस्थानों ने अब मरीजों से नगद भुगतान की मांग शुरू कर दी है।

अस्पतालों का ऐलान—5 दिन सेवाएँ बंद

एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ऑफ इंडिया (AHPI) ने घोषणा की है कि बकाया भुगतान न होने के विरोध में अस्पताल पाँच दिन तक आयुष्मान सेवाएँ स्थगित रखेंगे।
AHPI छत्तीसगढ़ के अध्यक्ष डॉ. राकेश गुप्ता ने कहा— “बिना फंड के अस्पताल चलाना असंभव है। अनिवार्य DGRC बैठकें भी समय पर नहीं हो रही हैं। शिकायत दर्ज करने का कोई प्लेटफार्म नहीं बचा है।”

बाल अस्पतालों पर सबसे ज्यादा असर

दस्तावेजों से पता चलता है कि निजी अस्पतालों में लाखों रुपये के बिल अटके हुए हैं। बाल चिकित्सा (पेडियाट्रिक) अस्पताल खासे दबाव में हैं, जहाँ महंगी सर्जरी और लंबी थेरेपी पर रोक जैसी स्थिति बन गई है।

बड़े अस्पतालों पर आरोप

रायपुर के रामकृष्ण केयर, वीवाई, दानी और एनकेएच सुपर स्पेशलिटी अस्पतालों पर मरीजों ने आरोप लगाया है कि वैध आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद उनसे नगद भुगतान की मांग की गई।
कुछ मरीजों को भले ही कैशलेस इलाज मिल रहा है, लेकिन कई गरीब परिवारों को या तो इलाज से वंचित होना पड़ा या फिर जमीन-जायदाद गिरवी रखकर पैसे चुकाने पड़े।

बिलासपुर के एक मरीज ने कहा— “योजना तो मुफ्त इलाज की है, लेकिन हमें इलाज के लिए अपनी जमीन गिरवी रखनी पड़ी।”
वहीं सुकमा से आए एक मरीज ने कहा— “हम यहाँ उम्मीद लेकर आए थे, लेकिन अस्पताल ने कहा कि आयुष्मान कार्ड काम नहीं कर रहा।”

अस्पतालों का पक्ष

रामकृष्ण अस्पताल के निदेशक डॉ. संदीप दवे ने साफ कहा— “बकाया लगातार बढ़ रहे हैं। फंड न मिलने से कैशलेस इलाज देना अब असंभव हो गया है।”

सरकार का दावा—फंड की कोई कमी नहीं

हालांकि राज्य सरकार ने फंड की कमी की बात से साफ इंकार किया है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने कहा—
“केंद्र की हिस्सेदारी सहित 505 करोड़ रुपये पहले ही जारी कर दिए गए हैं। जो अस्पताल इस योजना के तहत मरीजों का इलाज नहीं कर रहे, उन्हें हमें लिखित में देना चाहिए।”

मानवीय पहलू

इस बीच ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से आए कई परिवारों का कहना है कि “मुफ्त इलाज” का सपना अब बोझ बन गया है। जो योजना उनकी जिंदगी बचाने का साधन थी, वह अब उन्हें कर्ज और निराशा की ओर धकेल रही है।