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तिरंगा फहराने पर माओवादी अदालत में युवक की हत्या, ग्रामीणों में दहशत

कांकेर (छत्तीसगढ़), 22 अगस्त 2025।
स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा फहराना एक युवक की जान पर भारी पड़ गया। छत्तीसगढ़ के कांकेर ज़िले के बिनागुंडा गाँव में माओवादियों ने 18 अगस्त को एक युवक को पुलिस मुखबिर बताकर मौत के घाट उतार दिया।

पुलिस के अनुसार, मृतक की पहचान मनीष नुरेटी के रूप में हुई है। माओवादियों ने उसे घर से घसीटकर बाहर निकाला और ग्रामीणों के सामने तथाकथित “जन अदालत” लगाई। वहाँ न केवल मनीष को पीटा गया, बल्कि एक अन्य युवक को भी माओवादी हिंसा का शिकार होना पड़ा।

मनीष का अपराध यह था कि उसने 15 अगस्त को गाँव में बने माओवादी स्मारक पर तिरंगा फहराया और देशभक्ति के नारे लगाए। पुलिस ने बताया कि यह घटना स्वतंत्रता दिवस पर माओवादियों की विचारधारा के खिलाफ एक प्रतीकात्मक चुनौती थी, जिसे उन्होंने बर्दाश्त नहीं किया।

घटना के बाद परतापुर एरिया कमेटी के माओवादियों ने क्षेत्र में बैनर लगाए और हत्या की जिम्मेदारी ली। इन बैनरों में उन्होंने पुलिस पर आदिवासियों को गुप्तचर बनाने का आरोप लगाया और कई स्थानीय लोगों को धमकी दी। इनमें पंखाजूर थाना प्रभारी लक्ष्मण केवट, सरपंच रामजी धुर्वा और जिला रिजर्व गार्ड के सदस्य शामिल हैं।

बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी ने बताया कि मनीष नुरेटी का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वह स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फहराते और नारे लगाते दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा – “तथ्यों की जांच की जा रही है, और सत्यापन के बाद आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।”

गौरतलब है कि माओवादियों पर इस समय सुरक्षा बलों ने दबाव बढ़ा दिया है। केंद्र और राज्य सरकार ने 2026 तक माओवाद को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है। इसी साल 20 मई को छत्तीसगढ़ में माओवादी महासचिव नंबाला केसवा राव उर्फ बसवराजु की मौत हुई थी, जिसे पिछले एक दशक में सबसे बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।

बसवराजु पर 2010 में दंतेवाड़ा में हुए उस घातक हमले का मास्टरमाइंड होने का आरोप था, जिसमें 76 सुरक्षा जवान शहीद हुए थे। पिछले एक साल में 357 माओवादी मारे जा चुके हैं।

नक्सल आंदोलन की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से हुई थी और धीरे-धीरे यह छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैल गया। लंबे समय से इसे भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा माना जाता रहा है।

बिनागुंडा गाँव की यह घटना एक बार फिर से उस संघर्ष को उजागर करती है, जिसमें एक तरफ मासूम ग्रामीण देशभक्ति का जश्न मनाना चाहते हैं और दूसरी तरफ माओवादी हिंसा उन्हें खामोश करने की कोशिश करती है।