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“अमृतकाल” में लोकतंत्र पर थेथरई का साया, मतदाता सूची घोटाले से लेकर संसद तक फैला ढीठपन

रायपुर, 16 अगस्त 2025।
जिस समय को सरकार “अमृतकाल” कह रही है, वही समय जनता के बड़े हिस्से को विडम्बना और अंधकार का काल प्रतीत हो रहा है। यह दौर केवल राजनीतिक बयानबाजी का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की जड़ों को खोखला करने वाली थेथरई का दौर है।

थेथरई क्या है?
भोजपुरी और बिहार की बोलियों से आया यह शब्द उस ढीठ प्रवृत्ति का नाम है, जिसमें असत्य को बार-बार सत्य ठहराने की जिद की जाती है। गलती स्वीकारने की बजाय, उसे बेशर्मी से दोहराना और दूसरों को नीचा दिखाने के लिए हर मर्यादा तोड़ देना ही थेथरई कहलाता है। आज भारतीय राजनीति और संवैधानिक संस्थाएँ इसी के शिकंजे में हैं।

मतदाता सूची घोटाला – लोकतंत्र पर प्रहार
बेंगलुरु की महादेवपुरा सीट का खुलासा चौंकाने वाला है। विपक्ष की जांच में सामने आया कि इस एक विधानसभा सीट पर ही 1 लाख से अधिक फर्जी वोट डाले गए। हजारों नाम डुप्लीकेट पाए गए, अनेक बिना पते या फर्जी पते वाले निकले। यहां तक कि कई मतदाता ऐसे पाए गए, जो कर्नाटक के साथ-साथ वाराणसी और मुंबई में भी वोट डाल आते हैं।

इतना ही नहीं, इस पूरे पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के दौरान देशभर से 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। चुनाव आयोग से जब सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछे तो आयोग ने या तो चुप्पी साधी या ढीठ अंदाज में “ना” कहा। यही थेथरई है—सच सामने होने के बावजूद उसे स्वीकारने से इनकार करना।

संसद और सरकार – मुद्दों से भागती बहसें
पहलगाम और ऑपरेशन सिंदूर पर संसद में हुई बहस में भी यही प्रवृत्ति दिखी। रक्षा मंत्री सहमे-सहमे बोलते रहे, गृह मंत्री धमकी भरे लहजे में और प्रधानमंत्री ने ऊंची आवाज़ में सबको ढक लिया। मगर असल मुद्दा—भारत की वैश्विक अलगाव की स्थिति—पर चर्चा टाल दी गई। थेथरई यहाँ भी विजयी रही।

न्यायपालिका भी अछूती नहीं
मुंबई हाईकोर्ट के एक न्यायमूर्ति ने सीपीएम की रैली पर सुनवाई करते हुए संविधानिक अधिकारों पर गौर करने के बजाय राजनीतिक दल को “कौन-से मुद्दे उठाने चाहिए” का उपदेश देना शुरू कर दिया। न्यायालय की मर्यादा से परे जाकर यह वक्तव्य भी उसी ढीठ प्रवृत्ति का हिस्सा था।

लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी
आजादी की 78वीं वर्षगांठ के मुहाने पर यह माहौल शुभ संकेत नहीं देता। लोकतंत्र और संविधान, जिन्हें देशवासियों ने लगभग दो शताब्दियों की लड़ाई और अनगिनत बलिदानों के बाद हासिल किया था, वे आज बार-बार असत्य और निर्लज्जता के बोझ तले दबाए जा रहे हैं।

भोजपुरी की कहावत है—
“थेथर की गत, आखिर में दुर्गत।”
लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ा सबक है। जो सत्ता आज थेथरई को हथियार बना रही है, उसे याद रखना चाहिए कि इतिहास में कोई भी व्यवस्था जनआक्रोश के ज्वार को तिनकों से रोक नहीं सकी है।