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सरकारी अस्पतालों की बदहाल स्थिति पर हाईकोर्ट सख्त, कहा – ‘स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल’

रायपुर, 7 अगस्त 2025
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य के सरकारी अस्पतालों, विशेष रूप से राजधानी रायपुर में स्थित एम्स की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं पर कड़ी नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणियां कीं। यह याचिका राज्य के विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर स्वतः संज्ञान लेते हुए दर्ज की गई थी।

कोर्ट ने एक प्रमुख हिंदी दैनिक की खबर का हवाला देते हुए कहा कि एम्स रायपुर में पंजीकरण के बाद मरीजों को डॉक्टर से मिलने में 48 घंटे तक इंतजार करना पड़ता है। अदालत ने कहा, “राज्य की बड़ी आबादी निजी अस्पतालों के खर्च वहन करने में सक्षम नहीं है और सरकारी अस्पतालों पर ही निर्भर है, ऐसे में इस प्रकार की लापरवाही अत्यंत चिंताजनक है।”

खंडपीठ ने कहा कि एम्स जैसे सर्वोच्च संस्थान में ऑपरेशन के लिए चार महीने तक इंतजार करवाया जा रहा है, जबकि एक्स-रे के लिए तीन घंटे की लाइन लग रही है। इसके साथ ही कोर्ट ने उस खबर पर भी संज्ञान लिया जिसमें बताया गया कि खराब गर्भावस्था परीक्षण किट, घटिया सर्जिकल उपकरण और निम्न गुणवत्ता की दवाएं वितरित की जा रही हैं, जबकि संबंधित आपूर्तिकर्ता कंपनी को पहले ही रोक लगाई जा चुकी थी।

अदालत ने टिप्पणी की, “अगर ये खबरें सही हैं तो राज्य के स्वास्थ्य विभाग और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन (CGMSC) की कार्यप्रणाली पर गहरी आशंका उत्पन्न होती है।” कोर्ट ने बिलासपुर के एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की रिपोर्ट का भी उल्लेख किया जहाँ 15 डॉक्टरों के पदस्थ होने के बावजूद सुबह 11:15 बजे तक कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था और 250 से अधिक मरीज कतार में इंतजार कर रहे थे।

इसके अलावा, ‘हमर लैब’ जैसी जांच सुविधा भी CGMSC द्वारा अभिकर्मक (reagents) न भेजे जाने के कारण वर्षों से निष्क्रिय पड़ी है।

इन सभी चिंताजनक पहलुओं पर संज्ञान लेते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के स्वास्थ्य विभाग सचिव को व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने साफ किया कि सरकारी स्वास्थ्य प्रणाली में इस प्रकार की लापरवाहियों को सहन नहीं किया जाएगा।