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खैरागढ़ विधानसभा उपचुनाव : छजकां प्रत्याशी की शर्मनाक पराजय, नोटा से भी पिछड़े, महज मिले 1208 वोट

रायपुर (छत्तीसगढ़)। खैरागढ़ विधानसभा उप चुनाव में कांग्रेस ने एकतरफा जीत हासिल कर ली हैं। नोटा तीसरे क्रम पर रहा। यहां कांग्रेस उम्मीदवार यशोदा वर्मा ने भाजपा के कोमल जंघेल को 20 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हराया है। सबसे बुरी हालत यहां जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के प्रत्याशी की हुई है। उनको केवल 1208 लोगों के ही वोट मिले हैं। नोटा, फाॅरवर्ड डेमोक्रिटिक लेबर पार्टी और एक निर्दलीय प्रत्याशी को उनसे भी अधिक वोट मिले।

खैरागढ़ विधानसभा उपचुनाव के लिए 12 अप्रैल को मतदान हुआ था। इसमें कुल 2 लाख 11 हजार 516 को वोट डालना था। लेकिन 78.39% लोग ही मतदान के लिए पहुंचे। यानी एक लाख 65 हजार 407 लोगों ने ही इस चुनाव में वोट डाला था। इनमें से कांग्रेस उम्मीदवार यशोदा वर्मा के पक्ष में 87 हजार 640 वोट पड़े। भाजपा प्रत्याशी कोमल जंघेल को 67 हजार 481 लोगों ने वोट डाला। उसके बाद सबसे अधिक दो हजार 607 वोट नोटा को पड़े हैं। यानी इस उप चुनाव में नोटा तीसरे नंबर पर रहा। चौथे स्थान पर फाॅरवर्ड डेमोक्रिटिक लेबर पार्टी के चूरन (विप्लव साहू) रहे। उनको दो हजार 408 मतदाताओं का समर्थन मिला। वहीं निर्दलीय उम्मीदवार नितिन कुमार भांडेकर को भी एक हजार 409 वोट मिल गए। जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के उम्मीदवार नरेंद्र सोनी को केवल एक हजार 208 वोट मिले हैं। यहां शेष पांच उम्मीदवारों को एक हजार से भी कम वोट से संतोष करना पड़ा है।
याद दिला दें कि छत्तीसगढ़ विधानसभा के लिए 2018 में हुए आम चुनाव में जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ ने देवव्रत सिंह को मैदान में उतारा था। खुद के जनाधार और छजकां और बीएसपी के संगठन की मदद से देवव्रत सिंह को 61 हजार 576 वोट मिले थे। यह कुल पड़े वोटों का 36% था। भाजपा उम्मीदवार कोमल जंघेल उस चुनाव में दूसरे स्थान पर आए। उन्हें 60 हजार 646 वोट मिले थे। वहीं कांग्रेस के सीटिंग विधायक गिरवर जंघेल तीसरे स्थान पर खिसक गए थे।
विधायक देवव्रत सिंह के निधन के बाद खैरागढ़ राजपरिवार में कई तरह के विवाद खड़े हुए। देवव्रत सिंह के रहते संगठन ने नेतृत्व की दूसरी लाइन वहां खड़ा ही नहीं किया था। विधायक के असमय निधन के बाद चुनाव हुए ताे जनता कांग्रेस ने सहानुभूति के सहारे वापसी की कोशिश की। जकांछ ने देवव्रत सिंह के बहनाई नरेंद्र सोनी को मैदान में उतारा। कोशिश थी कि इसके सहारे राजपरिवार समर्थक वोट को एकजुट किया जाए। लेकिन यह संगठन पर भारी पड़ गया। कई स्थानीय नेता प्रत्याशी के नाम पर प्रचार से पीछे हट गए। ग्रामीण क्षेत्रों में सीमित पहचान और संसाधनों के अभाव में जकांछ अपनी बात को लेकर बड़े वर्ग तक नहीं पहुंच पाई।